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धारकुण्डी के महायोगी परमहंस स्वामी सच्चिदानंद ब्रह्मलीन

 


जबलपुर। 
धारकुण्डी पीठाधीश्वर, महायोगी परमहंस 1008 स्वामी सच्चिदानंद  महाराज के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनकी अंतिम यात्रा के दौरान जबलपुर में अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। रविवार तड़के लम्हेटा बायपास पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु, शिष्य एवं आमजन एकत्र हो गए और गुरुदेव के अंतिम दर्शन कर श्रद्धांजलि अर्पित की। पूरा वातावरण “गुरुदेव की जय” के उद्घोष और मौन श्रद्धा से गूंजता रहा।


                                                   



शनिवार रात्रि को महाराष्ट्र के बदलापुर आश्रम में स्वामी के शरीर शांत होने के बाद उनके पार्थिव शरीर को श्रद्धापूर्वक धारकुण्डी आश्रम के लिए रवाना किया गया। यात्रा के दौरान जब उनका काफिला नागपुर से होते हुए जबलपुर पहुंचा, तो सड़क के दोनों ओर श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। लोगों की आंखें नम थीं और हर चेहरा शोक व भक्ति से भरा हुआ दिखाई दे रहा था।

पूज्य स्वामी की समाधि 9 फरवरी, सोमवार को जिला सतना स्थित धारकुण्डी आश्रम में दी जाएगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार यह समाधि यथार्थ गीता के रचयिता परम पूज्य परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद महाराज के मार्गदर्शन में संपन्न होगी। स्वामी अड़गड़ानंद महाराज शनिवार को ही धारकुण्डी आश्रम पहुंच चुके हैं।

इधर, लाखों की संख्या में भक्त परम पूज्य धारकुण्डी सरकार के अंतिम दर्शन के लिए आश्रम की ओर पहुंच रहे हैं। वहीं धारकुण्डी सरकार के परम शिष्य स्वामी जगमित्रानंद महाराज भी लम्हेटाघाट स्थित परमहंस हंस आश्रम से धारकुण्डी के लिए प्रस्थान कर चुके हैं।

102 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन

स्वामी सच्चिदानंद महाराज का संपूर्ण जीवन तप, त्याग और साधना को समर्पित रहा। गुरु आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने घनघोर जंगल में प्रवेश कर वर्षों तक कठोर तपस्या की और बाद में धारकुण्डी आश्रम की स्थापना की, जो आज विंध्य क्षेत्र का एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है। जंगल की नीरवता में प्रज्वलित उनकी धूनी ने असंख्य लोगों के जीवन को नई दिशा दी। उनके दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं को शांति, साहस और आत्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती थी। उनके मुखमंडल पर तप की आभा, वाणी में सत्य की प्रखरता और हृदय में करुणा की गहराई स्पष्ट झलकती थी।

स्वामी सच्चिदानंद  महाराज का संदेश सदा सरल और प्रेरणादायी रहा। देश-विदेश में उनके लाखों अनुयायी हैं। संत समाज ने उनके ब्रह्मलीन होने को आध्यात्मिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। संतों का कहना है कि भले ही स्वामी  ने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया हो, किंतु वे सूक्ष्म रूप में सदैव अपने भक्तों और साधकों के बीच विराजमान रहेंगे।

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