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21 मार्च को मनाया जाएगा गणगौर व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि



हिंदू पंचांग में गणगौर व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। यह व्रत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार इस वर्ष यह व्रत 21 मार्च 2026, शनिवार को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं माता गौरी और भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।

16 दिनों तक चलता है गणगौर पर्व

गणगौर पर्व की शुरुआत होली के अगले दिन से हो जाती है। यह व्रत पूरे 16 दिनों तक चलता है और इसे पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल तृतीया का दिन इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है, क्योंकि इसी दिन गणगौर का समापन और विसर्जन किया जाता है।

कब है गणगौर व्रत

चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 21 मार्च 2026 को दोपहर 2:30 बजे से होगी और इसका समापन उसी दिन रात 11:56 बजे होगा। इस कारण 21 मार्च, शनिवार को ही गणगौर का व्रत रखा जाएगा।

क्या है पूजा का शुभ समय

इस दिन सूर्योदय सुबह 6:24 बजे होगा। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:49 से 5:36 बजे तक रहेगा, जिसे पूजा की तैयारी और ध्यान के लिए शुभ माना जाता है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:04 से 12:52 बजे तक रहेगा, जो किसी भी कार्य की शुरुआत के लिए उत्तम समय माना जाता है। वहीं संध्या का समय 6:32 से 7:43 बजे तक रहेगा, जो आरती और पूजा के समापन के लिए शुभ है।

क्या है गणगौर का महत्व

गणगौर दो शब्दों से मिलकर बना है—‘गण’ का संबंध भगवान शिव से और ‘गौर’ का संबंध माता पार्वती से माना जाता है। यह पर्व पति-पत्नी के प्रेम, समर्पण और वैवाहिक सुख का प्रतीक है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं, जबकि कुंवारी कन्याएं मनचाहा जीवनसाथी पाने की कामना से गणगौर माता की पूजा करती हैं।

कैसे की जाती है पूजा

गणगौर पूजा में पवित्र मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्तियां बनाई जाती हैं और उन्हें सुंदर वस्त्र पहनाकर सजाया जाता है। होली के अगले दिन से महिलाएं सुबह जल्दी उठकर दूध और फूल लेकर गीत गाते हुए पूजा करती हैं। पूजा के दौरान सोलह श्रृंगार किया जाता है और पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं। व्रत के अंतिम दिन इन मूर्तियों का नदी, तालाब या सरोवर में विसर्जन किया जाता है।

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और धार्मिक परंपराओं पर आधारित है। इसकी सत्यता और सटीकता की पुष्टि स्वतंत्र रूप से की जानी चाहिए।

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