जबलपुर। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने शनिवार को जबलपुर प्रवास के दौरान डुमना नेचर पार्क में नगर निगम द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 'कैच द रेन' अभियान के तहत वर्षा जल संचयन प्रणाली का शुभारंभ किया। साथ ही "एक पेड़ माँ के नाम" अभियान के अंतर्गत पौधरोपण कर शहर में 11 लाख पौधे लगाने के अभियान की शुरुआत की। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि जल और प्रकृति का संरक्षण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है तथा वर्षा जल की हर बूंद का संरक्षण समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
कार्यक्रम में लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह, महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू, सांसद आशीष दुबे, विधायक अशोक रोहाणी, सुशील कुमार तिवारी 'इंदु', डॉ. अभिलाष पांडे, नीरज सिंह, संतोष वरकड़े सहित जनप्रतिनिधि एवं प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
मियावाकी पद्धति से विकसित होंगे हरित वन
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि मियावाकी पद्धति पर्यावरण संरक्षण की एक प्रभावी और वैज्ञानिक तकनीक है। इसके माध्यम से कम समय में घने, प्राकृतिक और आत्मनिर्भर वन विकसित किए जा सकते हैं। उन्होंने नगर निगम जबलपुर के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रदेश के अन्य नगरीय निकायों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा।
कैच द रेन अभियान का शुभारंभ
मुख्यमंत्री ने डुमना नेचर पार्क में वर्षा जल संचयन प्रणाली का विधिवत शुभारंभ किया। इस प्रणाली के माध्यम से 10 हजार वर्गफुट छत क्षेत्र से प्राप्त वर्षा जल का संग्रहण कर 30 फीट गहरे रिचार्ज बोर के जरिए भू-जल स्तर को बढ़ाने का कार्य किया जाएगा। इसका उद्देश्य वर्षा जल का स्थानीय स्तर पर संरक्षण और भू-जल पुनर्भरण सुनिश्चित करना है।
'एक पेड़ माँ के नाम' अभियान के तहत किया पौधरोपण
मुख्यमंत्री ने बरगद, पीपल और नीम के पौधे लगाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। इसी के साथ डुमना नेचर पार्क में मियावाकी पद्धति से 11 लाख पौधों के रोपण अभियान का शुभारंभ भी किया गया। यह पौधरोपण लगभग 225 एकड़ क्षेत्र में किया जाएगा। अभियान का उद्देश्य हरित क्षेत्र का विस्तार, जैव विविधता का संरक्षण, स्वच्छ पर्यावरण और भावी पीढ़ियों के लिए समृद्ध प्राकृतिक विरासत तैयार करना है।
क्या है मियावाकी पद्धति?
मियावाकी पद्धति जापान के प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी द्वारा विकसित वृक्षारोपण तकनीक है। इसमें स्थानीय प्रजातियों के पौधों को सघन रूप से लगाया जाता है, जिससे कम समय में घना और प्राकृतिक जंगल तैयार हो जाता है। इस तकनीक से पौधों की वृद्धि तेज होती है, जैव विविधता बढ़ती है, कार्बन अवशोषण अधिक होता है और वायु शुद्धिकरण के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। यही कारण है कि शहरी क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ाने के लिए इसे अत्यंत प्रभावी तकनीक माना जाता है।